सुनो बिटिया तुम अब न आना इस देस,
न ही जन्म लेना किसी कोख से,
जिन लाडो से पाला करते है तुम्हें,
उतना ही दृढ़ बनाना चाहते है तुम्हें,
पर हैवानों की संख्या अब बढ़ गई है,
गली, शहर, घर, विद्यालय, कार्यालय,
हर जगह गीदड़ की तादात बढ़ रही है,
तुम्हें केवल देह मान कर ये नोच खाएंगे,
क्या लगता है इस पूरे जनम में,
हम तुम्हें इंसाफ दिला पाएंगे,
और अब इंसाफ की गुहार करना ही नहीं है,
न जन्म देना है हमें बेटी को,
जिसके लिए ये समाज बना ही नहीं है,
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