मैं मानव नयी सदी का मैंने नूतन आविष्कार किये

दैहिक-भौतिक सारे सपने मैंने ही साकार किये


मायाजाल बनाया मैंने, मन उसमे उलझाया

छीन गयी शांति, बंध गया मन, स्वातंत्र्य हेतु अकुलाया


कभी कभी नवजात शिशु सा चीखता हूँ चिल्लाता हूँ

कभी कभी माया मृग बन कर सीता को बहलाता हूँ


कभी न सोचा था कि मैं भी दास बन सकता हूँ

मैं तो सोचा करता था मैं ही भाग्य विधाता हूँ