गीत- #मक़सद_इन_हवाओं_का


मक़सद इन हवाओं का,जाना - पहचाना हैं,

जैसे ये हवाएं,पीर तेरी गाती हों।


ये टपकती हुई बूंदे और ये नग्न आस्मां,

तेरे नैनों के मोती ,रूह पे टपकाती हों।


ये हिलोरे खाते वृक्ष , और उनकी हिलती झाड़ियां,

मानो मुझको ये सब कुछ ,तेरी राह दिखाती हो।


रुत ये जो अाई हैं , और भी लगती अच्छी ,

गर मेरा यह गीत , तुम साथ गाती तो।


ये फलक़ पर दौड़ते हुए,मेघ ऐसे जाते हैं,

मानो इन पर विराजमान हो,तुम कहीं पर जाती हो।


फील थोड़ी होती जेलसी,मुझको हवा झोको से,

क्योंकि हाल - ए - दिल अपना, तुम सिर्फ़ इन्हें बताती हो।


काश ये हवाएं ,छत पे तेरे जाती हों,

तू जहां खड़ी होकर , गीले केश सुखाती हो।