मृत्यु की ओर अग्रसर अपने प्राणों को मां भारती के चरणों में बलिदान कर देने वाले एक सैनिक के मन में उसके अंतिम समय में आने वाले भाव-
कविता- #जा_रहा_हूं_मैं_छोड़कर_इस_कायनात_को
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को,
याद आएगा मेरी मां के हाथों का खाना
वह उसका पैरहन घनी छांव ममता की
स्याह रातों में जागकर वो लोरिया गाना
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को,
याद आएगा मेरे पिता का वह विचरण कराना
वह अपना पेट काट काट कर मुझको पढ़ाना
वह अपनी थाली के पकवान मुझ को खिलाना
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को,
याद आएगा मेरी बहन संग खेलना
वह उससे लड़ना झगड़ना वह बचपन की यादें
वह राखी पर राखी बांध मिठाई खिलाना
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को,
याद आएगा वह भाई संग पतंग उड़ाना
वह छत पर जाकर फलक से नजरे लड़ाना
वह भाई संग बाजार साइकिल से जाना
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को,
याद आएंगे वह भार्या संग लिए कसमे वादे
वो अग्नि फेरे वो फलक का चांद करवाचौथ का
वह संग संग जीने वाली हर एक यादें
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को,
याद आएगा वह दिवस वो लक्ष्मी का आगमन
वो उर्वशी की थाम अंगुली उसे चलना सिखाना
रहे वह खुश हर जगह कहे पिता का मन
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को,
याद आएगा वह बेटे की तबस्सुम बातें
वह उसका पापा कह कंधे पर बैठ जाना
वह उसकी तोतली बोली वाली प्रत्येक बातें
जा रहा हूं मैं छोड़कर इस कायनात को.......
On demand of - Munna Bhai
Pic Credit - Dharmendra Singh Kuntal


