चोट खाए हुए हैं इधर चारागर क्यूँ नहीं आते
भटक रहे इधर -उधर यायावर घर क्यूँ नहीं आते

अरसे से मुंतज़िर बैठे हैं शिफ़ा के हम "बशर"
वक़्त मरहम है तो येह जख़्म भर क्यूँ नहीं जाते

डॉ. एन. आर. कस्वाँ 'बशर' bashar بشر