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शबे-हयात


जग रहे थे हम अपनी शबे- हयात मेंक़िस्मत मग़र सो गई ग़मों की रात में!

उम्मीदों ने जब दम अपना तोड़ दियादर्द रोया खूब मसर्रतों की वफात में!

— डॉ.एन.आर.कस्वाँ
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