ज़रूरी हैं



खुदगर्जी के फैले अंधेरों में, सुबह का आना ज़रूरी हैं.......

नेक बहारों के वास्ते पतझड़ का अब जाना ज़रूरी हैं........



तरक्की की अंधी दौड़ में आदमी कर रहा शोर-शराबा.........

सुकून-ए-क़ल्ब के लिए पंछियों का अब गाना ज़रूरी हैं.......



अमीर तो हैं बहुत झूठे वादों में, दिखावे की ये दुनिया.........

भूखे बेबस गरीबों के लिए थोड़ा अब खाना ज़रूरी हैं........



झेल रहा हैं मजदूर कब से ज़ालिम ज़माने के ज़ुल्मों को........

रहम की बारिश के लिए बादलों का अब छाना ज़रूरी हैं.........



अक़्ल के ग़रूर में इंसां समझता खुद को मालिक जहां का........

सही औकात के लिए कुदरत से सबक अब पाना ज़रूरी हैं........



तबाह कर रहा हैं स्वार्थ का शैतान प्रकृति के ख़ज़ाने को.........

आनेवालीं नस्लों के लिए महफ़ूज़ कल अब लाना ज़रूरी हैं.......



तंग आ गई हैं कायनात सारी, इंसान की काली करतूतों से.........

भलीं फसलों के लिए प्यार का मुबारक अब दाना ज़रूरी हैं........



- नरेश कुशवाहा