' विवेक मेरे देश का '
बना आभूषण, भगवे परिवेश का......
दुनियाने देखा, विवेक मेरे देश का......
दिखाई थी तेजस्विता अपने बचपन में.......
अनोखी थी दिव्यता उसके तन-मन में......
जोश और जिज्ञासा से भरी थी जवानी......
शुरू हो गई नरेन्द्र से विवेक की कहानी.....
था इंतज़ार उसे गुरु के आदेश का.......
दुनियाने देखा, विवेक मेरे देश का.......
गुरु दर्शन से हुआ नये जीवन का प्रयास......
स्वामी जी ने हर्ष से, ग्रहण किया संन्यास......
हिन्द को लेकर साथ गए धर्म संसद में.......
ज्ञान से हुए सफल, वे अपने मकसद में......
था शिर पर सदा आशिष महेश का......
दुनियाने देखा, विवेक मेरे देश का.......
चाहते थे वे जनसेवा से जीवन को संवारना.......
संस्था रूपमें की गुरू के ध्येय की स्थापना......
कर्तव्य का रखें ध्यान ज्यादा, अधिकारों से.......
युवाओं को किया प्रेरित, अपने विचारों से......
रखना हैं मान हमें उनके संदेश का.......
दुनियाने देखा, विवेक मेरे देश का.......
बना आभूषण, भगवे परिवेश का......
दुनियाने देखा, विवेक मेरे देश का......
- नरेश कुशवाहा


