वीर मेवाड़ी प्रताप ने....
सुनकर दहाड़ शेर की, मुग़ल लगते थे कांपने.......
हिन्द को न झुकने दिया वीर मेवाड़ी प्रताप ने.......
उदय के आंगन उदय हुआ सिसोदिया सरताज........
पराक्रम से जिसने रखी थी क्षात्रधर्म की लाज........
बनाया शौर्यवान उसे एकलिंग जी के जाप ने........
हिन्द को न झुकने दिया वीर मेवाड़ी प्रताप ने.......
अकबर से लड़ाई चित्तौड़ के शक्तिमान की थी......
सियासत की नहीं, ये जंग तो स्वाभिमान की थी......
भाला बनकर तराज़ू मुग़लों को लगा था नापने.......
हिन्द को न झुकने दिया वीर मेवाड़ी प्रताप ने.......
मान का न रहा मान लड़ा जो मुग़लई शान में.......
जौहर दिखा राणा का हल्दीघाटी के मैदान में.......
परखा था सालार को चेतक के पैरों की छाप ने.......
हिन्द को न झुकने दिया वीर मेवाड़ी प्रताप ने.......
साथियों का मिला साथ, प्रतिज्ञा बड़ी निराली थी.......
वनों में कटता जीवन, रूखी सूखी तेरी थाली थी.......
अडिग बनाया इरादा तपते हुए सूरज के ताप ने........
हिन्द को न झुकने दिया वीर मेवाड़ी प्रताप ने.......
शत्रुओं ने भोगा परिणाम राणा से खिलवाड़ का.......
चित्तौड़ ना सही पर तुमने चित्त जीता मेवाड़ का........
शौर्य को तेरे किया था सलाम सलीम के बाप ने........
हिन्द को न झुकने दिया वीर मेवाड़ी प्रताप ने.......
सुनकर दहाड़ शेर की, मुग़ल लगते थे कांपने.......
हिन्द को न झुकने दिया वीर मेवाड़ी प्रताप ने.......
महाराणा प्रताप की जय।
- नरेश कुशवाहा


