शिवा तेरी तलवार से......
कांपते थे दुश्मन, मराठा केसरी की ललकार से.......
अधर्मी के घमंडी सिर कटे शिवा तेरी तलवार से.......
वीर तान्हाजी, सपूत संभाजी........
जय हो छत्रपति जय शिवाजी.......
जीजाबाई की कोख से शेर जन्मा शाहजी का तनय.......
कोंडदेव से सीखी युद्धकला, समर्थ से सीखा विनय.......
आदर करतें प्रेम से लोग सभी राजे तेरा सत्कार से........
अधर्मी के घमंडी सिर कटे शिवा तेरी तलवार से.......
निराशा की घोर निंद्रा में सो गया था साहस कहीं.......
विवश वनों में खो गया था विजय का मानस कहीं......
चलाई निडरता की नाव तूने पराक्रम की पतवार से.......
अधर्मी के घमंडी सिर कटे शिवा तेरी तलवार से.......
छोटी सी आयु में देख लिया था स्वराज का सपना.......
पूरा करने में जिसे, खपा दिया जीवन सारा अपना.......
शत्रुओं से पा लिया राज बड़ा सा अपनी तकरार से.........
अधर्मी के घमंडी सिर कटे शिवा तेरी तलवार से.......
बलशाली बाजुओं से बनाईं थीं न्यायी नूतन नीतियां........
सुशासन में तेरे दिखतीं थी हिन्द की सनातन रीतियां.........
उबार लाए प्राचीन विरासत को तूफ़ानी मझधार से........
अधर्मी के घमंडी सिर कटे शिवा तेरी तलवार से.......
राह में मुश्किलें हो कितनी ही, हिम्मत नहीं हारनी हैं........
परिश्रम से विश्वफ़लक पे छवि भारत की उभारनी हैं........
प्रेरणा यही तो मिलती हैं हमें महा मराठा सरदार से........
अधर्मी के घमंडी सिर कटे शिवा तेरी तलवार से.......
कांपते थे दुश्मन, मराठा केसरी की ललकार से.......
अधर्मी के घमंडी सिर कटे शिवा तेरी तलवार से.......
वीर तान्हाजी, सपूत संभाजी........
जय हो छत्रपति जय शिवाजी.......
- नरेश कुशवाहा


