नाम हो गया.......



ग़रीब था बेबस हर वक्त, अमीरों का यहां काम हो गया.......

दिखावे की इस दुनिया में दौलत वालों का नाम हो गया.......


सच्चाई और सादगी तो रह गई झोंपड़ियों में सिमटकर........

ये ऊंचे मकानों की मगरूरी का महंगा यहां दाम हो गया........


उसूलों पर चलने वाले चलते रहे कांटों से भरी राहों पर..........

बेगैरतों का बड़ी आसानी से ऊंचा यहां मक़ाम हो गया...........


बुराई के बहकावे में हर तरफ बदमाशों का हैं बोलबाला..........

अच्छाई की बातें करने वाला शरीफ़ यहां बदनाम हो गया..........


मज़बूर होकर मुफ़लिस जूझ रहा हैं अपनीं ज़रूरतों से............

धनवानों के मोटे लालच का घोड़ा यहां बेलगाम हो गया...........


हुनर को पहचानतें हैं दफ़्तर अक्सर बड़ी सिफ़ारिशों से...........

महज़ कोशिशें करने वाला काबिल यहां नाकाम हो गया...........


सिर्फ़ अपने लिए ही जी रहें हैं छोटी सोच वालें लोग बड़े..........

अपनों के लिए जी रहा भला आदमी यहां आम हो गया...........


निर्धनों का भूखा बचपन तरसता रहा थोड़े से अनाज को..........

महलों में सजतीं महफ़िलों का जल्द यहां इंतज़ाम हो गया.........


देखकर दुनिया मतलबी सोचता होगा ऊपरवाला भी कभी.........

मेरी बनाई इन्सानियत का आज क्या यहां अंजाम हो गया..........



- नरेश कुशवाहा