किसीने......
नहीं तन की, मन की सुंदरता से सजाया हैं.......
किसीने इस जहां को, खूबसूरत बनाया हैं........
सुबह की सुनहरीं, चमकतीं ये किरणें प्यारीं......
शरमा कर चलीं जातीं शबनम की बूंदें सारीं......
ये मुस्कुरातीं कलियों को उसी ने हंसाया हैं......
किसीने इस जहां को, खूबसूरत बनाया हैं........
बादल आसमां से रिमझिम बारिश बरसाते.......
प्यासे पेड़-पौधों को वो अपने जल से हर्षाते......
पानी से भरी नदियों को उसी ने बहाया हैं......
किसीने इस जहां को, खूबसूरत बनाया हैं........
ऊंचे-ऊंचे पर्वतों से ये निचे आते हुए झरनें.......
मैदानों से महक मिट्टी की, पवन लगे भरने.......
नज़ारों में नई ताज़गी को उसी ने जगाया हैं.......
किसीने इस जहां को, खूबसूरत बनाया हैं........
सागर की नटखट लहरें साहिल से मिलतीं.......
सितारों के संग में रात को चांदनी खिलती.......
बहारों को बागों का पता उसी ने बताया हैं......
किसीने इस जहां को, खूबसूरत बनाया हैं.......
हरे-भरे जंगलों में सुकून से पंछी गीत गाते......
नीले आसमां से संध्या के रंग मिलने आते.......
अच्छे अरमां को दिलों में उसी ने बसाया हैं.......
किसीने इस जहां को, खूबसूरत बनाया हैं........
नहीं तन की, मन की सुंदरता से सजाया हैं.......
किसीने इस जहां को, खूबसूरत बनाया हैं........
- नरेश कुशवाहा


