किसान हूं मैं.......
ओ धरती के लाल...........
तूं बड़ा करता कमाल.........
रखे सबका खयाल.........
फ़िर बुरा क्यूं तेरा हाल.........
युगों की मेहनत से बना ये धरती की शान हूं मैं.......
बहाकर पसीना जहां को पालता किसान हूं मैं........
धोरी चलाता धरा पर, हल को बनाकर हथियार.......
अन्न उगाता सबके लिए, जग सारा मेरा परिवार..........
आलस की अंधेरी रात को मिटाता विहान हूं मैं........
बहाकर पसीना जहां को......
महकती मिट्टी से रहे आबाद आने वालीं नस्लें........
मुस्कुराते इन खेतों में लहराए ख़ुशी की फसलें..........
परवरिश में इनकी रोज़ लगाता जी-जान हूं मैं.........
बहाकर पसीना जहां को......
सूखा बनता जीवन मेरा जब पड़े मौसम की मार.......
बहा ले जाती हैं ख़ुशियां मेरी निर्दय बाढ़ की धार.........
सूद के भूखे भेड़ियों से जान बचाता दिशान हूं मैं........
बहाकर पसीना जहां को.........
उपज को मूल्य उचित, श्रम को मेरे सम्मान मिले.......
मेरे बच्चों के चेहरों पर भी मीठी सी मुस्कान खिले.......
फ़रिश्ता नहीं सेवा में जीवन खपाता इंसान हूं मैं........
बहाकर पसीना जहां को.......
युगों की मेहनत से बना ये धरती की शान हूं मैं.......
बहाकर पसीना जहां को पालता किसान हूं मैं........
ओ धरती के लाल...........
तूं बड़ा करता कमाल.........
रखे सबका खयाल.........
बदले अब तेरा भी हाल.........
- नरेश कुशवाहा


