तेरी ये दिलकश चाँदनी मेरे भी घर आए कभी....
ऐ चाँद आसमाँ के तूं ज़मीं पर उतर आए कभी....
रहता है तूं बहुत दूर मुझसे कैसे करूँ मुलाक़ात....
आऊँगा मिलने मेरे अरमाँ को जो पर आए कभी....
रोज़ भेजता है ये चकोर भरोसे से संदेश अपना....
मिला की नहीं तुझे इसकी भी ख़बर आए कभी....
रहकर बादलों में देखता रहता है हर मंज़र यहाँ.....
लंबा ये इंतज़ार हमारा तुझको नज़र आए कभी.....
गुनगुना लेना तूं भी रात में कोई ग़ज़ल प्यार की....
दिलमें जो किसीके वास्ते प्यार उभर आए कभी....
- नरेश कुशवाहा

