ज़मीनें  





पेड़ की शाखाओं से ही क्यो उतरता है चाँद     

भूमाफियाओं की नज़रों   

बिल्डरों की चालाकियों और  

नगरपालिकाओं की गड़बड़ियों में क्या इतनी भी ज़मीन नहीं बची है कि उतार सके ज़मीन पर चाँद


क्या जीवन की हर सिम्त मे 

यही रहेगा हाल 


क्या रचनाओं के संसार मे भी अब   

कोई नहीं कहेगा : 


अपनी ज़मीन पर खड़ा हू!  


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