तू कुछ बदला बदला सा नज़र आता है दोस्त था मिरा अब दुश्मन नज़र आता है ये तो किसी और की ही शह है तुझे, ख़ौफ़ मिरी आँखों का कम नज़र आता है उसकी बाज़ी,चालें उसकी,बिसात भी उसकी, मगर इस खेल का तू मोहरा नज़र आता है शिकस्त की शिकन साफ़ है तिरे माथे पर और तू कुछ डरा सहमा भी नज़र आता है #संतोष (मौलिक एवं अप्रकाशित)