है कहाँ कौन है कैसा वो नज़र आता हैख़ुद में कम मुझ में ज़ियादा वो नज़र आता है क्या तअल्लुक़ है मेरा उससे बताऊँ कैसेहर दुआ में मुझे चहरा वो नज़र आता है तिश्नगी जब मुझे दीदार की तड़पाये तो ऐसे हालात में दरया वो नज़र आता है घेर लेते हैं मुझे जब भी अंधेरे ग़म के मेरा हमदर्द अकेला वो नज़र आता है तुमने पूछा कभी “संतोष” से जाकर यारोकिसलिए भीड़ में तन्हा वो नज़र आता है