उस रोज न जाने किस सोच में

बैठे बैठे तुम पत्थरों को रगङने लगे

उससे उपजी अग्नि ने

तुम्हारे भीतर कई रूपों में प्रवेश पा लिया

क्रोध, आक्रोश, लालच, ईर्ष्या, हवस और न जाने कितनी ही...

तुम्हारा स्वाभाविक

सद चित् आनन्द रूप

स्त्री और पुरूष में विभाजित हो गया

अब तुम्हें वृक्षों का लहलहाना अच्छा नहीं लगता था/उसका तना पाना चाहते थे/ पत्तियाँ और जङें भी

टूकड़े टूकड़े करके

उसी दिन तो तुमने (कु) चक्र भी तो बना लिया था/ इसी के साथ व्यूह रचना भी सीख ली थी

पूरी प्रकृति उसी व्यूह और चक्र में उलझकर रह गई

पहाङों को काटकर उसकी ठंडक को दग्ध कर दिया

चारों ओर सिर्फ अाग ही दिखाई देने लगी/लालच की आग

नदियाँ सुखने लगी/ चिङियाँ फङफङाने लगी

जंगल और जंगली

इस दावानल में जलकर राख होने लगे ....

और

तुम हो कि अभी भी आग बरसा रहे हो सतत !!!


वन्दना दवे