मुसाफिर
लिखते रहो मुसाफिर तुम
लिखते रहो
लिखने का मंज़ूर किसी बयाँ से
न बनता
वह खुद लिखता
हम ढूंढते रहे
जूझते रहे
आंखिर किसको संजोते है
अंदर की गलतियों का सफ़ाई
बस और कुछ नहीं
खैर छोड दीजिए
दूसरों पर इलज़ाम लगाना
के खातिर खोजते रहे
पग पग पर
लिखता रहा मुसाफिर
शुरु कर दी उन्होंने
भाग्य विधाता से गुज़ारिश करने
पर भी


