मन के अंधियारे में।

जहां घृणा पनप रही

नफरत का बीज पला

तू इक दिया वहां जला


लाखों दिए जला तुमने

जगमग सरयू कर डाली

काश मिटा भी पाते तुम

अपने मन की स्याही काली