मुझको पत्थर कहने वाले !
मैं मोम था पहले ।
तब जिसने चाहा
मुझको जलाया, तड़पाया,
अपने-अपने सांचों में ढाला ।
शम्मा की शक्ल देकर ,
क़तरा क़तरा पिघलाया
शाम से सहर तक जलाया।।
मेरा कोई वजूद न था
सांचों के नाम से मैं जाना गया ।
जिन जिन शक्लों में ढाला
उनकी रंगत में पहचाना गया।।
फिर मैं पत्थर बन गया ।
संगतराश आते हैं अब भी
छेनी हथोड़ा लेकर ।
पर इतना आसान नहीं है अब,
मैं भी दर्द देता हूं उनको
जो मुझको दर्द देते हैं
अब तो लोग पूजते भी हैं मुझको
मुझे कोई शिकवा नहीं है ।।
तुझे पत्थर से दिल न लगाना हो
तो जा मोम के पास जा ।
ढाल ले उसको अपनी चाहत सा
मैं पत्थर हूं, मैं पत्थर ही रहूंगा।।


