तय करना चाहती हूँ तुम्हारे साथ सफर उतना ही बस
जितना तय करती है
भावनाएँ मेरी...
मन से मस्तिष्क तक,
मस्तिष्क से कलम तक,
कलम से कागज तक,
कागज से तुम्हारे इन होंठों तक,
होंठों से मुस्काते कपोल तक,
कपोलों से छलकते नयनों तक,
नयनों से कोमल मन तक,
और अन्ततः तुम्हारे मन से फिर मेरे मन तक भावनाएँ मेरी।
रहना चाहती हूँ भीतर ही तुम्हारे जैसे....
लौ....
घर के भीतर ही पूजा घर ,
पूजा घर में रखा वो दीपक,
दीपक में सिमटी हुई बाती
बाती में सोखा हुआ घी,
और अन्ततः जैसे दीपक की पवित्र लौ।
'नम्रता ऊषा शुक्ला'


