खिंची है दीवार यहाँ,धर्म और जाति की जो,

ऐसे सारे बंधनों को तुम अब तोड़िए।


फैलाया रगों में विष,जिनके आतंक ने जो,

ऐसे चण्ड-मुण्डों का उद्दण्ड तुम तोड़िए।


घायल यहाँ दंशों से,है मात भारती आज,

ऐसे भुजंगों की तुम गर्दन मरोडिए।


एक काम करो अब,बनो चक्रधर तुम,

ऐसे शिशुपालों पर सुदर्शन छोड़िए।


© नकुल गोयल