ये मन क्यों ऐसा हैं...?
कभी खूब हौसले जुटाता हैं
कभी हिम्मत हार जाता हैं!
ये मन क्यों ऐसा हैं...?
कभी आसमां छुने की बाते करता हैं
कभी खड़े होने की कवायत भी नहीं करता हैं!
ये मन क्यों ऐसा हैं...?
कभी दुनिया को जितने की चाह रखता हैं
कभी खुद से ही हार मान लेता हैं!
ये मन क्यों ऐसा हैं...?
कभी दूसरों को उम्मीद देता हैं
कभी ख़ुद ना-उम्मीद बन बैठता हैं!
ये मन आखिर क्यों ऐसा हैं...?
- नैना


