लौट जा ख़्याल ऐ ख़ामोशी में अपनी...
शोर-ऐ- शराबा तुम को राज़ ना आएगा..!
अरसा हो गया खुद से मुलाक़ात नही हुई...
कुछ ऐसे ख़ामोशी से मेरी बात नही हुई..!
कुछ बिछड़ सी गई हूं तुझ से...
यू कुछ मूकड़ सी गई हूं खुद से..!
तन्हाई से अपनी दूर
महेफिल मैं यू कुछ गुम सी गई हूं मैं...
रिहाई से तेरी
यू कुछ बंध सी गई हूं में..!
घुट रहा हैं
दर्द-ऐ-गम मेरा...
इस दिखावे की मुश्कान के बोझ तले..!
अब लौट जाना है मुझे अपनी ख्याल-ऐ-ख़ामोशी में..!


