एक तुझ जैसा एक मुझ जैसा,

दो किरदार अपनी जवानी की कहानी से आज तुमको रूबरू कराती हूं ,

एक तुझ जैसा एक मुझ जैसा,

नहीं ये तालुकात नहीं बता रही ये तो बस किरदारों के नाम फरमा रही हूं ।


 एक तुझ जैसा दिलकशी है,

जो ख़ामोश है समुद्र के किनारे की तरह ,

एक मुझ जैसा चंचल लहरों का पानी है,

तुझमें ठेराव है,

मुझमें बेबसी,

तुझमें संजीदगी है,

मुझमें अलहड़पन,

पर तुझ बिन्न कोई मुझे पूछता भी तो नहीं,

क्योंकि तू किनारा है और मैं नज़ारा हूं ।


तेरे तट पर बेचैन मन आते हैं,

मेरी लहरों के शोर में वो खुद को भुला जाते हैं,

एक शोर में जो हर दम नाचते गाते हैं ,

वो चुप चाप तुझ पर बैठकर बस मुझको ही निहारते जाते हैं।


सुकून हूं मैं उनका ,

पर तेरी ज़मीन उन्हें थोड़ी ज़्यादा प्यारी है,

तभी तो ज़माने में मुझ जैसों से ज़्यादा तुझ जैसों की चर्चा जारी है।


अरे हां माना तू ज़मीन से जुड़ा है,

पर मेरी भी गहराई कुछ कम नहीं,

तू जानता है तुझ जैसे की कीमत मेरे बिना क्या होगी,

ए मेरे किनारे वफाई तेरी इतनी है की तेरे बिना मुझ जैसे कि कीमत इस दुनिया में ना होगी।


आंधियों में सहारा तू था ,

जब मैं नज़ारा ना था तब भी मेरा किनारा तू ही था,

तू ही तो था जो थाम लेता था मुझे लाखों की भीड़ में भी ,

वरना कहां मुझ जैसों की कीमत किसीने तुझसे ऊपर मानी है ।


चल आज एक फासला तय करते हैं,

कुछ तुझ जैसा कुछ मुझ जैसा एक फैसला करते हैं,

तू मेरा बांध बन जाना पर रुकावटें बेमतलब की ना लगाना और जो हो जाऊं उग्र मैं तो शिव बन काली को सौम्य कर जाना ,

तेरी चमक कभी कम ना होगी,

ये लहरें शोर बरकरार रखेगी ,

बस मुझ जैसों के लिए तुझ जैसा एक किनारा सजा लेना,

फिर लिखते रहेंगे हम अपना ये फसाना कुछ तुझ जैसा कुछ मुझ जैसा।