ठहर जाता हूं चलते-चलते...

संभल जाता हूं फिसलते-फिसलते...


खामोश हो जाता हूं कहते-कहते...

मगन हो जाता हूं सुनते-सुनते...


खो जाता हूं सोचते-सोचते...

बुझ जाता हूं जलते-जलते...


सिमट जाता हूं डरते-डरते...

सवर जाता हूं करते-करते...


घबरा जाता हूं सोते-सोते...

जाग जाता हूं विचारते-विचारते...


उग जाता हूं टूटते-टूटते...

बच जाता हूं झड़ते-झड़ते...


उठ जाता हूं गिरते-गिरते...

जी जाता हूं मरते-मरते...


-नैना कौर