एक परिंदे ने आकर,
दी तेरी खबर...
कहता है, एक बात है,
जिससे हूं मैं बेखबर...
पूछा जब, तू कैसी है?
कहां उसने, पहले जैसी है...
फिर कहां तू खुश है,
पर मुझे लगा था तू रुष्ट है...
फिर सोचा, समझने में उससे,
कोई भूल हुई होगी...
शायद बात पकड़ने में,
कोई चूक हुई होगी...
पर, तेरे चेहरे की हंसी को,
उसने जब बयां किया...
समझ गया मैं, कि,
तुझे कोई और मिल गया...
तुझे मनाने के मैं तो,
तरीके खोज रहा था...
दिन-रात बस,
यही सोच रहा था...
अपनी गलती पर,
हां, पछता रहा था...
तेरे बिना तो मैं जैसे,
मुरझा रहा था...
ख्याल तेरे मुझे,
कुछ यूं सताते थे...
बीते हुए सारे लमहे,
याद दिलाते थे...
आंसुओं में तो जैसे,
डूब सा गया था...
सीने में मेरे जैसे,
कुछ चुभ सा गया था...
तुझसे बिछड़ने का मुझे,
इतना गम हुआ...
लोगों से भी मिलना,
बहुत कम था हुआ..
पर तेरी इस खबर ने जैसे,
हिला कर रख दिया...
जिंदगी को मेरे,
मिटा कर रख दिया...
दिल ने तो जैसे,
धड़कना छोड़ दिया...
सांसों ने भी मेरा जैसे,
साथ तोड़ दिया...
पर अब नहीं करूंगा,
तेरा मैं इंतजार...
शायद अब ना हो मुझे,
फिर किसी पर ऐतबार...
तू खुश रहे,
आज भी यही दुआ करता हूं...
नसीब में नहीं तू मेरे,
फिर भी तुझपर ही मरता हूं...
हो कभी मुलाकात,
तो हाथ मिला लेना...
थोड़ा ही सही,
पर अपनापन जता देना...
क्या कभी प्यार किया था मुझे?
बस इतना बता देना...
मेरी क्या खता थी?
बस इतना समझा देना...
बस इतना समझा देना...
- दिलप्रीत कौर (नैना कौर)


