समुद्र पर तैरती हुई एक सीपी मैंने पाई...
मुंह उसका खुला था, पानी उसमें भरा था, फिर भी ना वह डूब पाई...
जब पूछा मैंने उससे, क्यों ना गई तू समुद्र की गहराई में..?
कहां है तेरे अंदर का मोती? मुझे तो कहीं ना दिखाई दे...
कहां उसने मुझसे, मैं भी तेरे जैसी हूं...
मुंह जब खुला होता है, तो बिन मोती के रहती हूं...
तू भी बेमतलब की, दिन भर बात करता है...
लोगों की निंदा चुगली में, तुझको आनंद मिलता है...
अपने दिल की गहराई में, खुदा को नहीं ढूंढ पाता है...
इसलिए तू भी मेरी तरह, मोती बिन रह जाता है...
जो चाहता है खुद में मोती, चुप होना तू सीख जा...
अपने दिल की गहराई में, तू डूब जाना सीख जा...
तुझमें मोती का अंकुर, जिस दिन फूट जाएगा...
तेरे अंदर का कीड़ा भी, उस दिन मर जाएगा...
तेरी फिर कीमत, उस दिन बढ़ जाएगी...
बड़ा, चमकीला मोती जिस दिन, दुनिया तुझमें पाएगी...
-नैना कौर ग्रोवर


