सर उठाकर निकला घर से, मैं खरीदने सम्मान को...
पर हर जगह बस बिकता पाया, मैंने ईमान को...
जब पहुंचा एक दुकान, पूछे दोनों के दाम...
तब कहां उसने मुझे, यहां नहीं मिलता सम्मान...
क्योंकि सम्मान के दाम, छू रहे है आसमान...
और बिक रहा है ईमान, कौड़ियों के दाम...
तो शहर-शहर गली-गली, मैं भटकता रहा...
हर दुकान पर सम्मान को, मैं ढूंढता रहा...
ढूंढते-ढूंढते तब, मैं पहुंचा एक दुकान...
जहां पर लिखा था, यहां मिलता है सम्मान...
जब पहुंचा मैं अंदर, और पूछे सम्मान के दाम...
तब कहां दुकानदार ने, दे दो ईमान और ले जाओ सम्मान...
मैं सम्मान की होड़ में, वहां ईमान को बेच आया...
सर झुकाकर ही सही, आज सम्मान को घर ले आया...
-नैना कौर / @NainaKaur1101


