इन राहों पर चलना मुझे, ना जाने कब आ गया...
रूठे हुए दिलों को मनाना, ना जाने कब भा गया...
हसरतें तो अनेक थी, दबाना इन्हें कब आ गया...
गैरों की खुशी में मुझे, मुस्कुराना कब आ गया...
पतझड़ के मौसम में, खिलना कब आ गया...
अनजानो से ना जाने मुझे, मिलना कब आ गया...
आंसुओं को अपने, छुपाना कब आ गया...
इस दुनिया ने इतना बड़ा मुझे, ना जाने कब बना दिया...


