वो फूल नहीं मैं, जो मुरझा जाऊं
वो काटा भी नहीं, जो चुभ जाऊं
वो धूप नहीं मैं, जो तपा जाऊं
वो बरसात भी नहीं, जो भिगा जाऊं
वो ग्रीष्म नहीं मैं, जो झुलसा जाऊं
वो शीत भी नहीं, जो जमा जाऊं
वो आग नहीं मैं, जो जला जाऊं
वो मोम भी नहीं, जो पिघल जाऊं
वो हवा नहीं मैं, जो तूफान लाऊं
वो उमस भी नहीं, जो स्वेद लाऊं
वो जल नहीं मैं, जो प्यास बुझाऊं
वो प्रवाह भी नहीं, जो बाढ़ लाऊं
वो धरती नहीं मैं, जो धस जाऊं
वो भूमि भी नहीं, जो भूकंप लाऊं
वो वृक्ष नहीं मैं, जो छाया पहुंचाऊं
वो सेंहुड भी नहीं, जो चोट पहुंचाऊं
वो शेर नहीं मैं, जो खूंखार कहलाऊं
वो पंछी भी नहीं, जो कैद हो जाऊं
वो संगीत नहीं मैं, जो प्रसन्न कर जाऊं
वो राग भी नहीं, जो रुला जाऊं
वो गुड नहीं मैं, जो मिठास दे जाऊं
वो नीम भी नहीं, जो कड़वाहट लाऊं
वो भाला नहीं मैं, जो हानि पहुंचाऊं
वो कवच भी नहीं, जो ढाल बन जाऊं
वो गुलाल नहीं मैं, जो फीका पड़ जाऊं
वो मजीठ भी नहीं, जो रंग चढाऊं
वो प्यार नहीं मैं, जो होश उड़ाऊं
वो यार भी नहीं, जो साथ निभाऊं
वो सवाल नहीं मैं, जो उलझा जाऊं
वो जवाब भी नहीं, जो मिल जाऊं
वो शब्द नहीं मैं , जो तीर चलाऊं
वो वाणी भी नहीं, जो मौन हो जाऊं
वो पत्थर नहीं मैं, जो चोट पहुंचाऊं
वो कपास भी नहीं, जो कोमल कहलाऊं
वो ख्वाब नहीं मैं, जो टूट जाऊं
वो हकीकत भी नहीं, जो सच हो जाऊं
वो इत्र नहीं मैं, जो खुशबू दे जाऊं
वो कूड़ा भी नहीं, जो गंद फैलाऊं
वो वीर नहीं मैं, जो शहीद हो जाऊं
वो आतंकी भी नहीं, जो जान ले जाऊं
वो पुण्य नहीं मैं, जो स्वर्ग दिलवाऊं
वो पाप भी नहीं, जो नर्क पहुंचवाऊं
वो सुहागन नहीं मैं, जो सेज सजाऊं
वो विधवा भी नहीं, जो सती हो जाऊं
वो भोगी नहीं मैं, जो रस मनाऊं
वो जोगी भी नहीं, जो सन्यासी कहलाऊं
मैं कौन हूं, ये मैं क्यों बताऊं?
भेद अपना, खुद ही क्यों खोल जाऊं?
हां, पर मैं वो हूं, जो 'कौर' कहलाऊं
दिल में तो आऊं, पर समझ ना आऊं
-नैना कौर / @NainaKaur1101


