खुली हवा क्या होती है,
हम लड़कियों ने तो कभी जाना ही नहीं...
पैदल हो या स्कूटी पर,
स्कार्फ बांधना तो हम कभी भुले ही नहीं...
सांस ना भी लेते बने स्कार्फ में,
तो भी बांधना पड़ता हैं...
कोई भी ऐरा गैरा इश्क ना कर बैठे,
इसलिए इस चेहरे को छुपाना पड़ता हैं ...
चलो ना करे इश्क पर,
उनके कमेंट से भी डरते हैं...
फिर दिन भर सोच-सोच कर,
डिप्रेशन में दिन गुज़ारा करते हैं...
मां को बताते तो कहती,
तुझे स्कार्फ बांधकर जाना चाहिए था...
और पापा को बोलो तो कहते,
तुझे बाहर जाना ही नहीं चाहिए था...
हम तो जैसे एक कैदी हैं,
जिन्हें कपड़े के पीछे चेहरा छुपाना पड़ता हैं..
ताकि कोई कुछ बोल ना दे,
इसलिए अपनी ही पहचान को छुपाना पड़ता हैं...
क्या करें मजबूरी जो हैं,
डर नहीं है पर घबराहट तो हैं...
ऐसी ही नहीं एसिड अटैक और रेप होते हैं,
बिना स्कार्फ की लड़कियों को लोग कहां जीने देते हैं...
पर वक्त का भी दस्तूर देखो,
आज सभी को नकाब में लाया है...
जब नहीं लेती बनती है सांस मास्क में,
कैसे पहनती होगी स्कार्फ लड़कियां, उन्हें अब समझ आया है...
लड़कियां तो फिर भी अब खुश हो गई,
ढकती थी पूरा जो चेहरा स्कार्फ से, अब सिर्फ मास्क पहनकर थोड़ी खुल गई...
पर उनका क्या होगा जिनको कभी आदत ही नहीं थी...
जो चाहते थे औरतो को रखना घुंघट में,
बताओ कैसे जी रहे होंगे वो खुद इस नकाब में...
शौक नहीं हम लड़कियों को स्कार्फ में चेहरा छुपाने का,
पर क्या करें मजबूरी में बांधना पड़ता है...
कहने को रिपब्लिक है सबको अधिकार है अपने ढंग से जीने का,
पर औरतों को आज भी मर्द से दबना पड़ता है...
-नैना कौर / @NainaKaur1101


