घर से एक पैगाम आया,

साथ में था एक फूल मुरझाया...

कब आ रहे हो वो पूछ रही थी,

तबीयत मां की नासाज है, कह रही थी...


तभी एक मुखबिर आया,

साथ में एक आदेश था लाया...

जाना होगा सरहिंद पर,

आतंकियों ने है घेरा लगाया...


उसी वक्त अपने साथियों संग,

चल दिया करने मैं जंग...

वतन की रक्षा करने की,

खाई जो थी हमने कसम...


जब पहुंचा सरहिंद को,

भूमि का ऋण चुकाने को...

गोलियों की बरसात में,

सब आतुर थे भीग जाने को..


तभी कहीं से गोली ने आकर,

सीने को मेरे भेदा...

आतंकियों को मार गिराकर,

तब मैं ज़मीन पर लेटा...


आखिरी पलों में मैंने,

सारी यादों को समेटा...

फिर शहीदों का सरताज बनाकर,

मुझे यारों ने तिरंगे में लपेटा...


आ रहा हूं घर, खबर ये बताई,

वो पगली खुशी से, फूली ना थी समाई...

शायद इन बातों से, वो अंजानी थी,

कोई तो खुशखबरी थी, जो उसे मुझे सुनानी थी....


-नैना कौर