एक दाना शक्कर का हमसे क्या नीचे गिरा...
मुख़्तसर वक्त में ही चींटियों की कतार लग गई...
अर्थात->
जिस तरह एक गिरे हुए शक्कर के दाने को अनावश्यक समझकर हमने छोड़ दिया...वैसे ही हमारी जिंदगी में ऐसे कई अवसर आते हैं जिसे हम छोटा समझ कर छोड़ देते हैं... परंतु हम यह नहीं समझ पाते कि उस अवसर के पीछे तो लोगों की कतार लगी थी... और हमने हाथ आया हुआ अवसर व्यर्थ ही गवा दिया...
-नैना कौर


