चार कदम कामयाबी के चढ़कर,
गुमान छाया मुझ पर इस कदर...
हसने लगा मैं ज़ोर-ज़ोर से,
अपनों को पीछे खड़ा देखकर...
जब बढ़ाने लगा मैं अगला कदम,
ठोकर लगी मुझे इस कदर...
सहारे को जब मैं ताकता रहा,
तब अपनों ने ही उठाया हाथ देकर...
तब गुमान मेरा हो गया चूर,
और समझ आई अपनों की कदर...
कि कामयाबी तो होती चंद दिनों की,
पर अपने ही देते साथ ज़िंदगी भर...
-नैना कौर / @NainaKaur1101


