इस दीवाली सजे रंगोली , तेरे मेरे सपनों की

तू भर देना रंग प्यार के , आकृति में अपनों की ...

नीला पीला हरा गुलाबी , जो भी तुझको भा जाए

मिट न पाए जीवन भर तक , खाना कसमें अपनों की ...

इस दीवाली सजे रंगोली ...


धीरे - धीरे लोग देखने यह तस्वीर भी आएंगे

पूछेंगे ये कौन है ज़ालिम ? कहना मेरे अपनों की ...

कोई तो होगा उसमें ऐसा , देख.. मिटाना चाहेगा

मिट जाने का ग़म न करना , लगा के सीने अपनों की ...

इस दीवाली सजे रंगोली ...


तस्वीरों से बातें करना ये तो चलन पुराना है

तू भी उससे कुछ कहना , कुछ सुन लेना तू अपनों की

कौन बनेगा तेरा अपना , कौन पराया हो जाएगा

चार दिनों का ग़म रहेगा , यादें होंगी अपनों की ...

इस दीवाली सजे रंगोली...


- नईम मोहम्मद -