क्यूँ हर वक़्त सच केहता है ये आईना?
क्यूँ हर रोज़ मेरी उम्र के खिलाफ गवाही देता है ये आईना?
मेरे बिखरे बालोंको देख कर केहता था, कंघी खरीद ले दोस्त
अब केहता है, टोपी खरीदने का वक़्त आ गया है दोस्त
करता था तारीफ मेरे गलों के मुस्कान के आँखोंकी गेहराई की
अब करता हे मज़ाक मेरे चहेरे की झुर्रियों की आँखों के चश्मेकी
लेकिन जिस्म को देखने वाले जिगरके दर्द को तू क्या जाने
गिरे हैं, उठे हैं, और ज़ख्मो से क्या सीखे है वो हम ही जाने
अब उन्ही चश्मोंसे नए नज़रिये से दुनिया को देखता हूँ
जूठ को सच और सच को जूठ कहने वालो को पहचानता हूँ
लेकिन आईना आज करनी है तुज से एक बात
उसे समझ ले मेरे दिल की एक दरख्वास्त
सच को सच ही केहना और जूठ को जूठ ही केहना
और हर रोज़ मेरी उम्र के खिलाफ गवाही देते रेहना
- नैमिष
