"वक्त न सवर रहा न गुजर रहा है,
लगता है बंधी है पैरों में बेड़ियां ये न आगे बढ़ रहा है,
वक्त की इस पाबंदी से यारों मुझको लड़ना पड़ रहा है,
शोख हवा का झोका मेरी गलियों से न चल रहा है,
आंखो का उजाला गया अंधियारों से सामना करना पड़ रहा है,
इस सरोवर का पानी यारों बहते बहते ठहर जाता है और बर्फ बन रहा है,
सूरज की लालिमा तो निकलती है मगर चांद मेरा न निकल रहा है,
गुजारिश करता हूं इन्हीं लम्हों से ठहर जाओ मेरे साथ तुमसे लड़ना मुश्किल पड़ रहा है,
उसकी यादों का ही सिलसिला है शायद जो न सवर रहा है न संभल रहा है,
थरथराती पुल सी लगती है जिंदगी जब वक्त का रेल मुझसे होकर गुजर रहा है,
हर चेहरा अजनबी सा लगता है मेरा स्वयं से सामना करना पड़ रहा है,
वक्त न सवर रहा है न गुजर रहा है !"


