समय की चाल ने बनाया चक्रव्यूह कैसा,
लोग स्मरण करते रोते फंसते बहते डूबते गए,
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आंखों से ओझल होकर दूर दूर खोते गए,
फंसा जो इस चक्रव्यूह में लुटता ही गया,
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देखने वालों का हृदय टूटकर बिखर गया,
जन जन का अंतरात्मा भी दर्द से भर गया,
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कुछ की मिली अस्थियां तो कितने गुमनाम हुए,
मिली भी जिनकी अस्थियां वो भी बेनाम हुए ।


