यूं लम्हा लम्हा तुम्हारे बगैर जीना सीख गया,

कांटों की बात छोड़ो शोलों से चलना सीख गया ।

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तुमने सोंचा था हम बिना पिए ही लड़खड़ा जायेंगे,

देखो मुझे लड़खड़ाने की खातिर पीना सीख गया ।

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लगाया गले से जाम भीगना भी इसी से सीख गया,

डूबा रहता था जो कभी अब मैखाने तक चलना सीख गया ।

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प्यासे नहीं है अधर मेरे इनसे जाम लगाना सीख गया,

दर्द नहीं है सीने में जबसे तुमको भूलना सीख गया। 

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खुश हूं मैं इसी की खातिर बस पल पल जीना सीख गया,

गम होगा तुम्हें अब तो मैं रात और दिन काटना सीख गया ।