आज से बाईस बरस पहले 

उगा था कैक्टस इक

मेरी माँ के पुष्प के उद्यान में

प्रति दिन बढ़ता गया

चुभता गया जो! 

किंतु माली को बहुत था प्रेम उस से

कैक्टस को 'पुष्प-सम्बोधन'. . . ? 

भला किस को सुहाता?

छिन गया माली का वो अधिकार सारा

कैक्टस जो पुष्प था,

फिर कैक्टस सा हो गया था! 

हो गया था वह मलिन, 

जैसे विजय के बाद पराजय! 

लहलहा कर हँस रहा था 

उसपे अब उद्यान सारा! 

कैक्टस निर्वाक था, 

सब हँस रहे थे! 

कौन समझे, 

कैक्टस की अंतर्पीड़ा?