महफ़िल लगती थी, बड़ा जमावड़ा होता था।

लोग आते जाते, खाते- पीते, कोई ना सोता था।

जश्न मनता था हर पल का, काफी हलचल हुआ करता था।

ये जो खंडहर सा दिखता है वो कभी महल हुआ करता था।



अब हर दीवारें दोष देंती हैं, दरवाजे कोसते हैं।

बुझी बत्तियां, दीवारों की सीलन, चीत्कारते हैं।

रातें खफा थी ही, अब नींद भी है जा मिली।

गुट बना आते है सब, और दुत्कारते हैं।


पूछते है क्या हुआ? बताओ! मुंह खोलो तो!

मेहमान नहीं हैं, सन्नाटा है, आखिर तुम ही कुछ बोलो तो!

क्यों बंद हुआ ये जश्न अचानक?

या है ये मात्र एक स्वप्न भयानक?


बोलो, वह संगीत मधुर सा कहां गया?

वो पकवानों की खुशबू कहां गई?

वो मीठे सरबत, मीठी बातें,

किस्से, नज़्में, सब कहां गई? 


क्या बताऊं उन्हें, की वहीं जिम्मेदार हैं।

मेहमान, चमकीली बत्तियों व सुंदर दीवारों के तलबगार है।

सीलन दिखी, बुझी राख दिखी, घुप्प अन्धॆरी रात दिखी, 

तो रूठ गए। 

फिर क्या,

कुछ को छोड़ दिया, कुछ छूट गए।