किस्से अनगिनत, हजारों कहानियां
पर सुनने को हैं लोग कहां।
तुम आओगे, तो सब आएंगें
महफ़िल होगी, बांधूंगा समां।
पर खोखले हैं शब्द मेरे
किस्से, कविताएं, सब झूठी हैं
लेकिन बड़े ढोंगी हो तुम भी,
आे झूठ के व्यापारी।
सुनने - समझने का झूठ तो बोल ही लोगे।
फिर भी डरता हूं की नुकीले शब्दों से,
परदा ढोंग का, कहीं फट ना जाए।
जो शब्दों को, शब्दों से बांधा है
वह शब्दों का बांध कहीं हट ना जाए।
तब सुनने वाला न कोई होगा,
ना होगी महफ़िल, ना होगी समां
ना रहेगा रंगमंच, ना रहेंगे दर्शक
फिर शब्दों को लेकर जाऊंगा कहां?


