कभी हमारी कभी तुम्हारी बदल-बदल होती ललकार है, हमको दे दो आरक्षण नहीं तो बंद आज बाजार है , इस आरक्षण ने फैलाई देखो कैसी आग है, चारो ओर दिखाई देती अराजकता की बयार है| चार मरे गे चार मारे गे , फिर कल भारत खुल जाये गा, किस लिए लड़ रहे हो आपस में, इस आरक्षण से क्या मिल जाये गा | ये तो ओछी राजनीति है, जो जनता को लड़वाती है, बोट बैंक के चक्कर में , भारत बंद बुलाती है | आओ हम सब एक हो जाए, नयी सोच और नया नजरिया लाए , जो  सच्चे हक़दार है इसके , उसको उनका हक दिलवाए | छोड़ अपने स्वहित को , भारत हित सर्वोपरी बनाए, ओछे आरक्षण के चादर की, हम मिल जुल होलिका जलाए | ना पड़े जरुरत आरक्षण की , सब की राजनीति चौपट हो जाए, सुख सम्पन्न हो भारत का जन-जन , ऐसा कुछ हम भी कर जाएँ | एक बने और श्रेष्ट बने हम , ऐसा नया सबेरा लाए ......