सुबह शाम किताबों से खेलता जाता हूँ

ज़िंदगी का तमाशा बनते हुए देखता जाता हूँ।


कुछ पाने कि रोज कोशिश कर रहा हूँ

फिर भी कुछ छूटते हुए रोज देखता जाता हूँ।


ज़िंदगी के साहिल पे खड़ा हूँ

और उम्र कि कश्ती को गुजरते हुए देखता जाता हूँ।


ज़िंदा रहने की बहुत आरज़ू है मुझमें

फिर भी खुद को रोज मरते हुए देखता जाता हूँ।