तू भी अकेली,मैं भी अकेला।


तुम गंगा की अर्पण हो,

तुम यमुना के तर्पण हो।

तुम हो,साजन के आंगन की कली

तुम तो महकती बगिया हो।।


मुझें पता है कि तुम मेरी नही हो,

फिर भी क्यों गीत लिख रहा हूँ मैं।

मुझे पता है कि तुम खुश हो अपना घर बना कर,

फिर भी क्यों तुझें याद कर रहा हूँ मैं।।


तुम्हारी हँसी कहती है,

कि अभी तुम पूर्ण हो।

परन्तु,तुम्हारी आँखें कहती है,

कि अभी भी तुम अपूर्ण हो।

एक बार तुम भी मेरे आखों में देखों,

तुम भी अकेली हो, तो मैं भी अकेला हूँ।।