हर लब्जों में हर सपनों में 

सिर्फ जिक्र तुम्हारी होती है

हर सांसों में हर धड़कन में 

सिर्फ फिक्र तुम्हारी होती है 

फिर हर रातों में हर यादों में 

क्यूँ हिज्र तुम्हारी होती है 

सब कुछ हूँ तुम पर लुटा चुका

फिर, कमी कहाँ रह जाती है