विद्यार्थी एक तीव्र गति से बहती हुई नदी के समान होता है। नदी स्वयं को समग्र, सम्पूर्ण रूप में नहीं देख सकती मगर अध्यापक देख सकता है तथा वह विवेक पूर्ण दिव्य दृष्टि का सदुपयोग कर उसके जीवन को सद्-विकास का अमृत अन्यथा विष भी दे सकता है।। 

✍मुक्ता शर्मा त्रिपाठी 
हिन्दी अध्यापिका श इं ज सिं स मि स्कूल कोटला शर्फ़ बटाला गुरदासपुर