तुम्हें किसी से कभी अगर कुछ गिला हुआ है
तुम्हारे रस्ते से एक रस्ता मिला हुआ है
किसी से नाराज़गी ,भला क्या भला करेगी
हमारे घर ,दर-गुज़र का रस्ता खुला हुआ है
न कोई माफ़ी कोई तलाफ़ी जो काम आये
ख़ुदा के घर फिर तौबा का रस्ता खुला हुआ है
अना भुलाकर कभी अगर जो तुम आयी मिलने
तुम्हारे आगे हमारा सर फिर झुका हुआ है
dr Mukesh nausran

